हे देवताओं के आराध्य देव ! आपकी कीर्ति बड़ी पवित्र है।क्या आप मेरी बात को असत्य समझते हैं?ऐसा नहीं है। मैं उसे सत्य कर दिखाता हूं।आप धोखे में नहीं पड़ेंगे। आप कृपा करके अपना तीसरा पग मेरे सिर पर रख दीजिए।2.
मुझे नर्क में जाने का अथवा राज्य से च्युत होने का भय नहीं है, अपार दुख में पडने से भी नहीं डरता, मेरे पास फूटी कौड़ी भी ना रहे अथवा आप मुझे घोर दंड दे,यह भी मेरे भय का कारण नहीं है, मैं डरताहूं तो केवल अपनी अपकीर्ति से।
अपने पूजनीय गुरुजनों के द्वारा दिया हुआ दंड तो जीव मात्र के लिए अत्यंत वांछनीय है।
आप छिपेरूप से अवश्यही हम असुरों को श्रेष्ठशिक्षा दिया करते हैं,अतः आप हमारे परम गुरु हैं।आपसे हमलोगों का जो उपकार होता है उसे मैं क्या बताऊं, अनन्यभाव से योग करने वाले योगीगण जो सिद्धि प्राप्त करते हैं, वही सिद्धि बहुतसे असुरों को आपके साथ दृढ़भेदभाव करने से ही प्राप्त हो गई है।
जिनकी ऐसीमहिमा ऐसी अनंतलीलाएं है, वही आप मुझे दंड दे रहे हैं और वरुण पास से बांध रहे हैं, इसकी तो मुझे कोई लज्जा नहीं है और न किसी प्रकार की व्यथा ही।
पितामह की कीर्ति, पितामह का निश्चय सही था।
हे पितामह के शत्रु !आप उस दृष्टि से मेरे भी शत्रु हैं फिर भी विधाता ने मुझे बलात ऐश्वर्या लक्ष्मी से अलग करके आपके पास पहुंचा दिया है, अच्छा ही हुआ, क्योंकि ऐश्वर्या लक्ष्मी के कारण जीव की बुद्धि जड़ हो जाती है और वह यह नहीं समझ पाता कि:-
" मेरा यह जीवन मृत्युके पंजे में पडा हुआ और अनित्य हैं।"